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केन्द्रीय जेल के कैदियों द्वारा निर्मित ‘मास्क’ बना, लोगों की पहली पसंद ।

   जेल के बंदियों से मास्क बनवाने की कलेक्टर की इस पहल की राज्य स्तर पर सराहना हो रही है। कलेक्टर श्री यादव कहते हैं कि बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत की वजह से जबलपुर के कलेक्ट्रेट कार्यालय में खोले गए मास्क बिक्री काउंटर से सोमवार 16 मार्च को महज आधा घंटे के भीतर ही एक हजार मास्क देखते ही देखते हाथों-हाथ बिक गए। मास्क की मांग व आपूर्ति में संतुलन बना रहे इसलिए मास्क निर्माण क्षमता बढ़ाने सिलाई मशीनों की संख्या भी बढ़ाई जाएगी।
    केन्द्रीय जेल के अधीक्षक एवं डीआईजी जेल गोपाल ताम्रकार ने बताया कि करीब सौ कैदी 50 सिलाई मशीनों के माध्यम से प्रति दिन करीब एक हजार मास्क बना रहे हैं। मास्क की दिन-ब-दिन बढ़ती मांग को देखते हुए निर्माण क्षमता बढ़ाने के उद्देश्य से सिलाई मशीनों में बिजली की मोटर लगवा दी गई है। ताकि मांग के अनुरूप मास्क की सुगम आपूर्ति की जा सके। श्री ताम्रकार ने बताया कि जबलपुर केन्द्रीय जेल में मास्क निर्माण का अनुसरण कर अब पूरे देश के जेलों में मास्क बनाए जा रहे हैं।
    केन्द्रीय जेल में बने अब तक 4 हजार से अधिक मास्क बिक चुके हैं। साथ ही 11 हजार से अधिक मास्क निर्माण एडवांस पेमेंट के साथ आर्डर भी केन्द्रीय जेल को मिल चुका है। जबलपुर के मेडिकल कालेज, हाईकोर्ट, जिला न्यायालय, रेल्वे हास्पिटल, केण्टोनमेंट हॉस्पिटल, महाविद्यालयों के अलावा मुम्बई के ट्रस्ट ने भी एडवांस पेमेंट के साथ मास्क आपूर्ति का आर्डर दिया है।

कोरोना वायरस जैसी भयावह बीमारी की रोकथाम के लिए जबलपुर के नेताजी सुभाषचन्द्र बोस केन्द्रीय जेल के बंदियों द्वारा सूती कपड़े से निर्मित मास्क अपनी गुणवत्ता और कम कीमत की वजह से लोगों की पहली पसंद बन गया है। कोरोना के विरूद्ध लड़ाई में जबलपुर केन्द्रीय जेल के कैदियों की पहल की सर्वत्र सराहना हो रही है और यहां के जेल में मास्क निर्माण कार्य का अनुसरण कर अब देश भर की जेलों ने भी मास्क बनाने का काम शुरू कर दिया है।
    केन्द्रीय जेल के कैदियों से मास्क बनवाने के वैचारिक प्रणेता एवं सूत्रधार कलेक्टर भरत यादव ने बताया कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के मापदण्ड के अनुरूप यहां सूती कपड़े का तीन लेयरयुक्त मास्क निर्मित किया जा रहा है। श्री यादव ने बताया कि यहां बने मास्क सात रूपए प्रति नग की दर से बिक्री के लिए उपलब्ध हैं। दरअसल कोरोना वायरस की भयावहता की वजह से अचानक मास्क की बढ़ी मांग और बाजार में इनकी कम उपलब्धता की वजह से व्यापारी व दवा विक्रेता बाजार में अधिक कीमत पर मास्क बेच रहे थे। इस स्थिति से तात्कालिक रूप से निपटने और बाजार में पर्याप्त मास्क की उपलब्धता सुनिश्चित कराने की दृष्टि से केन्द्रीय जेल के कैदियों से मास्क बनवाने का निर्णय लिया गया। अब स्थिति ये है कि अपनी बेहतर गुणवत्ता और कम कीमत और रियूजेबल विशेषता के कारण केन्द्रीय जेल में बने मास्क लोगों की पहली पसंद बन गए हैं। जेल में बने सूती कपड़े के मास्क को साबुन से धोकर, सुखाकर और प्रेस कर कई बार इसका उपयोग किया जा सकता है। यहां बने मास्क की मांग दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।

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